राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर सवाल: प्रवेश आयु बढ़ने से घट रही छात्र संख्या, पहाड़ों में बढ़ी चिंता


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत कक्षा 1 में प्रवेश की न्यूनतम आयु सीमा 6 से बढ़ाकर 7 वर्ष किए जाने के कारण छात्र संख्या में गिरावट देखने को मिल रही है। विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में यह निर्णय कई व्यावहारिक कठिनाइयाँ पैदा कर रहा है। ग्रामीण परिवेश में 7 वर्ष की आयु तक बच्चों को विद्यालय में प्रवेश के लिए प्रतीक्षा कराना अभिभावकों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है, जिससे शिक्षा से दूरी और पलायन की समस्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
वहीं दूसरी ओर, निजी विद्यालयों में 3 वर्ष से कम आयु के बच्चों का प्रवेश जारी है। इस विरोधाभास से यह प्रश्न उठता है कि क्या यह नीति अप्रत्यक्ष रूप से निजी विद्यालयों को बढ़ावा दे रही है। साथ ही 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए आंगनबाड़ी या प्री-स्कूल स्तर पर पंजीकरण का प्रावधान तो है, लेकिन 6 से 7 वर्ष के बीच का एक वर्ष बच्चों के लिए स्पष्ट शैक्षिक व्यवस्था के अभाव में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों को आबाद रखना है और शिक्षा से जोड़कर रखना है, तो प्रवेश आयु सीमा पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 12 के अंतर्गत 25% आरक्षण के तहत बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश दिया जाता है। इस प्रावधान का उद्देश्य कमजोर वर्ग के बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना था, लेकिन वर्तमान में इसके क्रियान्वयन पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि कुछ निजी विद्यालय इस व्यवस्था के तहत मनमाने शुल्क दिखाकर सरकारी धन का अनुचित लाभ उठा रहे हैं।
ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि इस प्रावधान की पारदर्शिता और प्रभावशीलता सुनिश्चित की जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को वास्तव में उच्च गुणवत्ता वाले विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले।
कुल मिलाकर, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए नीतियों के व्यावहारिक पक्ष पर गंभीरता से विचार करना समय की आवश्यकता है, ताकि शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण हो सके और विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन जैसी समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके।
