“आजादी के 75 साल बाद भी डूंगर गांव सड़क से वंचित, ग्रामीणों ने खुद संभाला मोर्चा”


पोखरी विकासखंड के अंतर्गत डूंगर गांव में सड़क को लेकर सरकार और सिस्टम की विफलता एक बार फिर उजागर हो गई है। आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी नारी गदेरा–डामतोली होते हुए डूंगर गांव तक लगभग 3 किलोमीटर सड़क का निर्माण नहीं हो पाया है, जिससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।
सरकारी अनदेखी और लोक निर्माण विभाग पोखरी की उदासीनता से त्रस्त होकर अब ग्रामीणों ने खुद ही मोर्चा संभाल लिया है। गांव की महिलाओं और पुरुषों ने श्रमदान करते हुए सड़क की कटिंग शुरू कर दी है। बीते चार दिनों से महिलाएं लगातार श्रमदान कर रही हैं, जबकि अब ग्रामीणों ने आपसी चंदा इकट्ठा कर जेसीबी से सड़क कटवाने का कार्य भी शुरू कर दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि ब्रिटिश शासनकाल में डूंगर क्षेत्र के समाजसेवी पातीराम जी को जनसेवा के लिए ‘राय बहादुर’ की उपाधि दी गई थी, लेकिन विडंबना यह है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी उसी गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई।
इस श्रमदान और आंदोलन में सतेंद्र सिंह, रणजीत सिंह, इंदु, भुषण, संजय बर्तवाल, साक्षी परमार, अनीता देवी, प्रीति देवी, मुन्नी देवी, विजया देवी, मीना देवी, भुवनेश्वरी देवी, बसंती देवी, सुनीता देवी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।
ग्राम प्रधान दीक्षा बर्तवाल ने साफ चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सड़क निर्माण में विधायक और जनप्रतिनिधियों ने सहयोग नहीं किया, तो डूंगर गांव के ग्रामीण वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में वोट बहिष्कार करेंगे।
ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कहा—
“चुनाव के समय नेता गांव तक पहुंच जाते हैं, लेकिन सड़क की बात आते ही सब चुप हो जाते हैं।”
सड़क के अभाव में गर्भवती महिलाओं, बीमारों और बुजुर्गों को आज भी 3 किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे कई बार जान जोखिम में पड़ जाती है।
ग्रामीणों ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा—
“हमें आपकी रेलगाड़ी नहीं चाहिए, पहले गांव तक सड़क पहुंचाइए। डबल इंजन की सरकार में भी अगर गांव सड़क से वंचित है, तो यह सरकार और सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है।”
सरकारी मदद न मिलने के कारण अब यह आंदोलन केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सम्मान, अधिकार और विकास की लड़ुाई बन चुका है।
