साफ़ हवा, सेहतमंद ज़िंदगी: दिल्ली की हवा में बदलाव की बुनियाद ट्रांसपोर्ट सिस्टम से ही रखी जाएगी



नई दिल्ली:
“साफ़ हवा, सेहतमंद ज़िंदगी”—इस सोच को लेकर पॉलिसी थिंक टैंक Climate Trends ने हाल ही में एक वेबिनार आयोजित किया, जिसमें दिल्ली-NCR की हवा को बेहतर बनाने के लिए ट्रांसपोर्ट सेक्टर की भूमिका पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा: अब समय ‘जानकारी जुटाने’ का नहीं, ‘कार्रवाई’ का है—और उस कार्रवाई की शुरुआत गाड़ियों से होनी चाहिए।
पुरानी गाड़ियाँ, ज़हरीली हवा
EnviroCatalysts के संस्थापक सुनील दहिया ने साफ़ शब्दों में कहा, “BS-II और BS-III जैसे पुराने वाहन, जो अब तक चल रहे हैं, प्रदूषण का बड़ा कारण हैं। अगर हम BS-VI या इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ओर शिफ्ट करें, तो प्रदूषण में 80% तक की गिरावट मुमकिन है। लेकिन यह बदलाव अगले पाँच सालों तक टाल दिया गया तो लागत भी बढ़ेगी और लोगों की सेहत पर असर भी।”
दहिया ने यह भी रेखांकित किया कि हमारी नीतियों में सबसे बड़ी कमी है—“हिसाब का हिसाब नहीं।” उन्होंने कहा कि हमें गतिविधि आधारित और इमीशन-लोड आधारित ट्रैकिंग इंडिकेटर्स चाहिए ताकि यह तय हो सके कि कौन ज़िम्मेदार है और क्या असर हो रहा है।
हर दिन करोड़ों यात्राएँ, हर सांस में धुआँ
WRI India के काउस्तुभ चूके ने एक अहम आँकड़ा साझा किया: “दिल्ली की आबादी करीब 2.4 करोड़ है और NCR में लगभग 4 करोड़ लोग रहते हैं। अगर हर व्यक्ति सिर्फ एक यात्रा भी करे, तो प्रदूषण की मात्रा सोच से कहीं ज़्यादा हो जाती है। लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट का हिस्सा 50% से भी नीचे चला गया है।”
उन्होंने ‘Low Emission Zones’ की वकालत की—जैसे चांदनी चौक में पैदल यात्रा को बढ़ावा देना। चूके के मुताबिक, “कमर्शियल गाड़ियाँ संख्या में भले कम हों, लेकिन वही 79% NOx, 40% CO और 30–40% पार्टिकुलेट मैटर उत्सर्जित कर रही हैं। इनमें से ज़्यादातर गाड़ियाँ दिल्ली की नहीं, बल्कि यूपी और हरियाणा से आती हैं।”

हवा में ज़हर, दिल और दिमाग़ पर असर
AIIMS के डॉ. हर्षल साल्वे ने एयर पॉल्यूशन को एक ‘तीरथा त्रिकोण’ बताया, जिसकी चोटी पर मौत है, लेकिन असली बोझ नींव में छुपा है—दिल की बीमारियाँ, फेफड़ों की कमजोरी, अस्थमा, डायबिटीज़ और यहां तक कि डिमेंशिया जैसी बीमारियाँ। उन्होंने कहा, “ये सब रोज़ाना घटता है, लेकिन न तो हेल्थ रिपोर्टिंग में आता है, न पॉलिसी डिस्कशन में।”
उन्होंने ज़ोर दिया कि हमें ‘एकदम सही हल’ की तलाश में समय नहीं गंवाना चाहिए। जो उपाय अभी उपलब्ध हैं, उन्हीं से शुरुआत करनी होगी—और इसमें संचार विशेषज्ञों की भूमिका अहम है।
चलना और साइकिल चलाना, लेकिन कैसे?
IIT दिल्ली के डॉ. राहुल गोयल ने कहा, “दिल्ली की 50% यात्राएँ वॉकिंग से जुड़ी हैं—चाहे वो बस पकड़ना हो या मेट्रो से उतरने के बाद का सफर। लेकिन हम ऐसे बुनियादी ढांचे ही नहीं बना पा रहे जो चलने या साइकिल चलाने को सुरक्षित बनाएं। असल गवर्नेंस यहीं चूक जाती है।”
जिन्हें सबसे कम दोष है, वही सबसे ज़्यादा भुगतते हैं
वरिष्ठ पत्रकार चेतन भट्टाचार्य ने इसे ‘इक्विटी का मुद्दा’ बताया। “दिल्ली की 70% आबादी पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पैदल चलने या साइकिल पर निर्भर है। लेकिन इन्हीं लोगों को सबसे ज़्यादा ज़हरीली हवा का सामना करना पड़ता है—वो भी बिना किसी सुरक्षा के।”
उन्होंने कहा कि पॉलिसी मेकर्स, साइंटिस्ट्स, और CSOs को लगातार, ज़्यादा मानवीय भाषा में संवाद करना चाहिए। “हमें आंकड़े नहीं, अर्थ बताने होंगे—आज, अभी। और सबसे ज़रूरी है पारदर्शिता: डाटा भी खुले हों, और फैसले भी।”
नतीजा? अब बहाने नहीं, बदलाव चाहिए।
इस वेबिनार से एक बात साफ़ हुई—चाहे वो गाड़ियों की उम्र हो, स्वास्थ्य की गिरावट, या नीति की नाकामी—हर समस्या का हल मौजूद है। ज़रूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता, और उस सबसे अहम चीज़ की जो दिल्ली की हवा में गायब है: भरोसे और कार्रवाई की ताज़गी

