October 10, 2026

दो गायों से स्वरोजगार, पलायन को चुनौती

 

पहाड़ से पलायन की तस्वीर अक्सर रोजगार की तलाश में खाली होते गांवों के रूप में साआती है। लेकिन कुछ कहानियां इस तस्वीर को बदलने की उम्मीद भी जगाती हैं। रुद्रप्रयाग के जोंदाला गांव के नंदन सिंह नेगी 27 साल मुंबई में नौकरी करने के बाद कोरोना काल में बेरोजगार हुए, तो परिवार के साथ गांव लौट आए। सामने परिवार के भरण-पोषण और बच्चों की पढ़ाई की चुनौती थी। ऐसे में उन्होंने शहर की ओर दोबारा रुख करने के बजाय गांव में ही रोजगार की राह चुनी। दो गायों से डेयरी व्यवसाय शुरू किया और आज दूध, पनीर व मट्ठे की आपूर्ति कर अपनी आजीविका चला रहे हैं। देखिए, मजबूरी से शुरू हुए स्वरोजगार के इस सफर की कहानी।
नंदन सिंह नेगी, पशुपालक

मुंबई की नौकरी छूटी, तो नंदन सिंह नेगी के सामने रोजी-रोटी का संकट था। करीब 27 साल शहर में बिताने के बाद गांव लौटना उनके लिए एक बड़ा बदलाव था। परिवार की जिम्मेदारियां थीं और भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी। लेकिन उन्होंने मुश्किल हालात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। गांव में उपलब्ध संसाधनों को आजीविका का आधार बनाया और दो गायों से डेयरी व्यवसाय की शुरुआत कर दी। इस काम में पत्नी समेत पूरा परिवार जुटा। धीरे-धीरे डेयरी का काम आगे बढ़ा और गांव में ही रोजगार का एक नया रास्ता तैयार होने लगा।
रेणु देवी, पत्नी नंदन सिंह नेगी

नंदन सिंह की मेहनत अब स्थानीय बाजार तक पहुंच रही है। उनकी डेयरी से उत्पादित दूध, पनीर और मट्ठा तल्लानागपुर क्षेत्र के साथ रुद्रप्रयाग बाजार में भी आपूर्ति किया जाता है। उनकी यह पहल बताती है कि पहाड़ में रोजगार की संभावनाएं केवल सरकारी नौकरी या बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं हैं। पशुपालन और स्थानीय मांग पर आधारित छोटे व्यवसाय भी परिवार की आजीविका का जरिया बन सकते हैं। जोंदाला गांव के ग्राम प्रधान अनिल सिंह नेगी इसे गांव में रहकर स्वरोजगार अपनाने का उदाहरण मानते हैं।
अनिल सिंह नेगी, ग्राम प्रधान, जोंदाला

फाइनल: 27 साल मुंबई में नौकरी, कोरोना काल में बेरोजगारी और फिर गांव लौटकर दो गायों से शुरू हुआ कारोबार। नंदन सिंह नेगी का यह सफर बताता है कि परिस्थितियां भले ही मुश्किल हों, लेकिन स्थानीय संसाधनों और पारिवारिक सहयोग के सहारे आगे बढ़ने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं। हालांकि, पहाड़ में स्वरोजगार को व्यापक बनाने के लिए बाजार, पशुचिकित्सा सुविधाओं और सरकारी योजनाओं तक आसान पहुंच भी जरूरी है। नंदन की पहल इसी उम्मीद को मजबूत करती है कि पहाड़ में रोजगार के अवसर बढ़ें, तो गांवों में रहकर भी आत्मनिर्भरता की राह बनाई जा सकती है।
कुलदीप राणा / संवाददाता, रुद्रप्रया

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