भारकोटबार में चार दिवसीय मां नंदा देवी कौथिक, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
उत्तराखंड की समृद्घ लोक परम्पराये यहां की लोक संस्कृति की रीड़ की हड्डी है। यहां समय समय पर देवी व देवताओ के लोकनृत्य,देवयात्राये व धार्मिक अनुष्ठानो को आयोजित करने की पर परम्परायें सदियों पुरानी है।

इन्ही खास लोक परम्पराओ में से एक विकासखंड नारायणबगढ के दूरस्थ गांव भारकोटबार भंगोटा में हर तीसरे साल में आयोजित होने वाला मां शैलपुत्री नंदा देवी भारकोटबार कौथिक है। 4 दिवसीय इस नंदा कौथिक में क्षेत्र के 9 गांव सामिल होते है,जिसमें मां नंदा देवी को परम्परागत जागरो के माध्यम से कैलास से मायका बुलाने,पूजा अर्चना कर परम्परागत नृत्यो पर नाचा खिला कर वापस कैलाश भेजने की लोक परम्परा का प्रचलन है।
मंदिर समिति के सचिव मनवर सिंह मेहरा का कहना है कि लोक परम्पराओ में सोल्टा गांव के सती लोग अपनी कुलदेवी नंदा को अपने साथ ले रहे थे लेकिन जब देवी की शिला यहां से नही उठी तब से यहां देवी की पूजा की जाती है,इस स्थान से ही 12 साल में आयोजित हिमालयी सचल कुंभ श्री नंदा देवी राजजात यात्रा की मध्यमार्ग की मुख्य छंतोली सामिल की जाती है।
मनबर सिंह मेहरा सचिव मंदिर समिति।
भारकोटबार कौथिक में यहां के जनप्रतिनिधियो व सभी 9 गांव के ग्रामीणो का भरपूर सहयोग देखने को मिलता है,कनिष्ठ प्रमुख भूपेंद्र सिंह का कहना है कि भारकोटबार कौथिक प्रकृति व मनुष्य का समागम है जिसमें यहां के लोगो का तन मन धन से सहयोग रहता है।
भूपेंद्र सिंह कनिष्ठ प्रमुख नारायणबगढ।
मां नंदा देवी के इस खास कौथिक में घुडेत नृत्य,बुडेरा नृत्य,हाथी नृत्य व कृष्ण लीला श्रद्धालुओ की आकर्षक का केन्द्र रही। वही इस अवसर पर प्रदेशभर से कौथिक में पंहुची धियाणियां भावुक हो गई।
धियाण सबिता भण्डारी का कहना है कि मां नन्दा को ध्याण के रूप में मायका बुलाने की परम्परा है। इस कौथिक में हम ध्यियाणियो को भी मां नंदा की तरह बुला जाता हैऔर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
सबिता भण्डारी,धियाण।
