August 30, 2026

उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलें बनीं ‘टाइम बम’

देहरादून

 

नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से हुई तबाही ने हिमालयी राज्यों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं है। प्रदेश में सैकड़ों ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जिनमें कुछ को संभावित रूप से बेहद संवेदनशील माना गया है। ऐसे में समय रहते इनकी निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत करना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों की मानें तो अगर किसी संवेदनशील ग्लेशियर झील में अचानक पानी का दबाव बढ़ा और झील फटी, तो इससे निचले इलाकों में बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है।

वीओ- हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव के बीच ग्लेशियर झीलों का आकार और पानी का दबाव लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। हिमालयन वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के मुताबिक उत्तराखंड में करीब 426 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। इनमें से 13 झीलों को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी NDMA ने खतरनाक श्रेणी में चिन्हित किया है।

इन संवेदनशील झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से करीब 30 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं, जबकि करीब 8.10 करोड़ रुपये जारी भी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद कई तकनीकी और भौगोलिक चुनौतियों के चलते इन झीलों पर निगरानी तंत्र स्थापित करने का काम अभी तक अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाया है।

वसुंधरा ताल, माबांग, स्यूंतियांक्ति और प्युंगरु जैसी झीलों पर आधुनिक उपकरणों के जरिए लगातार निगरानी की योजना है। इसके लिए सेंसर, संचार और अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जाने हैं। हालांकि ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों तक उपकरण पहुंचाना और वहां प्रभावी संचार व्यवस्था कायम करना बड़ी चुनौती बनी हुई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल की घटना से सबक लेते हुए उत्तराखंड में संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी व्यवस्था को जल्द मजबूत करना होगा, ताकि किसी संभावित आपदा से पहले चेतावनी जारी कर निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

 

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