गैरसैंण में मिनी सचिवालय निर्माण में देरी पर पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह नेगी ने उठाए सवाल
मिनी सचिवालय निर्माण में 11 साल की देरी पर पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह नेगी ने उठाए सवाल, 20 करोड़ की योजना की लागत 80 करोड़ पहुंचने का जताया अंदेशा
कर्णप्रयाग। ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के भराड़ीसैंण में मिनी सचिवालय का निर्माण नहीं होने को लेकर पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह नेगी ने सरकार और नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के विकास की अवधारणा को साकार करने के लिए ग्रीष्मकालीन राजधानी में मिनी सचिवालय का निर्माण बेहद जरूरी है, लेकिन 11 साल बीत जाने के बाद भी इसके लिए प्रस्तावित चार एकड़ भूमि का हस्तांतरण तक नहीं हो पाया है।
पूर्व विधायक नेगी का कहना है कि यदि भराड़ीसैंण में मिनी सचिवालय स्थापित होता है और ग्रीष्मकाल के तीन से चार महीने तक सरकार नियमित रूप से यहां से कामकाज करती है, तो इसका सीधा लाभ पर्वतीय क्षेत्रों को मिलेगा। अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी से पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास योजनाएं तैयार होंगी। इससे पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं पर सरकार का ध्यान केंद्रित होगा और विकास कार्यों को गति मिलेगी।
उन्होंने बताया कि मिनी सचिवालय निर्माण के लिए करीब 20 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई थी। वहीं, 31 मार्च 2015 को भारत सरकार के उपक्रम वैपकोस (WAPCOS) को कार्य के लिए तीन करोड़ रुपये भी दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद पशुपालन विभाग की चार एकड़ भूमि का हस्तांतरण नहीं हो पाया। नेगी ने आरोप लगाया कि नौकरशाही की लापरवाही के चलते यह महत्वपूर्ण परियोजना वर्षों से लंबित है।
उन्होंने कहा कि 11 साल की देरी के कारण निर्माण लागत में भारी वृद्धि हो गई है। जिस मिनी सचिवालय के निर्माण की लागत पहले करीब 20 करोड़ रुपये आंकी गई थी, वह अब बढ़कर लगभग 80 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अंदेशा है। उन्होंने इस पूरे मामले की जांच कराने की मांग करते हुए सवाल उठाया कि आखिर चार एकड़ भूमि हस्तांतरित करने की प्रक्रिया 11 वर्षों तक किस स्तर पर अटकी रही।
पूर्व विधायक नेगी ने बताया कि उन्होंने जब इस संबंध में पत्राचार और सूचना के अधिकार के माध्यम से जानकारी जुटाई तो पशुपालन विभाग के निदेशक की ओर से जानकारी दी गई कि विभाग चार एकड़ भूमि हस्तांतरित करने के लिए तैयार है। इसके बावजूद अब तक भूमि हस्तांतरण नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि मिनी सचिवालय निर्माण में हुई देरी की जिम्मेदारी तय की जाए और परियोजना को शीघ्र धरातल पर उतारा जाए, ताकि ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण की मूल भावना के अनुरूप पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता मिल सके।
